कर्म प्रधान विश्व रचि राखा
गुरु से कपट मित्र से चोरी(हेराफेरी) या हो अंधा या हो कोढ़ी।। कर्म का फल जाता नहीं , सुदामा के एक मुट्ठी चने की हेराफेरी ने ही जीवन भर की दरिद्रता दी , जबकि परम ज्ञानी परम भक्त तत्ववेत्ता थे। साधारण मनुष्य कर्म फल से पीछा कैसे छुड़ा सकता है? फिर भी मनुष्य हेराफेरी से बाज़ नहीं आता है। अपनी मूर्खता और अज्ञानता को बुद्धिमानी समझ नित हेराफेरी कर जीवन पर बोझ बढ़ाता जाता है। स्वर्ग हो या नर्क सब यहीं है। कर्म प्रधान विश्व रुचि राखा ।। जो जस करहि, सो तब फल चाखा।। अतः सन्मार्ग का ही अनुसरण करना जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। क्यों कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन। जैसी होगी शुद्धि, वैसी होगी बुद्धि। जिस तरह एक सड़ा हुआ फल पूरी पेटी के फलों को सड़ा देता है, ठीक उसी तरह गलत ढंग से कमाया या बचाया हुआ एक रूपया भी किसी न किसी तरह बर्बादी की ओर खींच ले जाता है और लाखों का धन डुबा देता है और फिर लोगों को कहते सुना है न जाने ईश्वर हमें क्यों कष्ट दे रहा है ?हमने तो कुछ किया नहीं। जबकि मूल में कारण सिर्फ और सिर्फ होता है संचित कर्मों का परिणाम, जिसे ज्ञा...