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राम लक्ष्मण परशुराम संवाद

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प्रथम पद्यांश  चौपाई - नाथ संभुधनु भजनिहारा।  होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। आयेसु काह कहिय किन मोही।  सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।। सेवक हो जो करें सेवकाई । अरि  करनी परि करिय लराई।।  सुनहुं राम जेहि सिवधनु तोरा।  सहस्रबाहु सम हो रिपु मोरा।।  सो बिलगाइ बिहाइ समाजा। नत  मारे जेहंइ  सब राजा।। सुनि मुनि वचन लखन मुसकाने ।  बोले परसु धरहि अवमाने।। बहु धनुही तोरी लरिकाई।  कबहु न अब रिस कीन्हि गोसाईं।। तेहि धनु पर ममता केहि  हेतू। सुन रिसाय कह  भृगुकुल केतु।।  दो ० - रे नृप बालक  काल बस,  बोलत तोहि न संभार । धनुही सम त्ररिपुरारि  धनु,   विदित सकल संसार। सरल भावार्थ- परशुराम के पूछे जाने पर राम ने विनम्रतापूर्वक कहा- हे नाथ-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा ।उस दास के लिए क्या आदेश है। राम की यह विनम्रता पूर्ण वाणी सुनकर परशुराम बोले -सेवक वह होता है ,जो सेवा करता है। दुश्मन की करनी करने वाले से तो युद्ध की अपेक्षा है। जिसने भी यह धनुष तोड़ा है मेरे लिए वह सहस्त्रबाहु के समान शत्रु है। मैं उस...

मंगल भवन अमंगल हारी

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लेखन एवं संयोजन निर्देशन सरला भारद्वाज  नाटक मंगल भवन अमंगल हारी  प्रथम दृश्य   - (मंच पर माधव का प्रवेश ) माधव- भैया ओ भैया अविरल--हां माधव बोलो!  माधव -आज क्लास में सर ने एक चैप्टर पढाया और बताया की अंग्रेजों ने भारत को जातियों मे बांट कर आपस में लड़ाया। क्या यह बात सच है भैया? अविरल -हां बेटा बिल्कुल सच है,  भारत में यह जातियां पहले नहीं  थी,  केवल कर्म था। जातियां तो बस दो ही थीं।वह थीं सभ्यता के आधार पर,! माधव- कौन कौन सी जातियां? अविरल -बस दो ही जातियां  थीं यह थी  मानव  जाति और दानव जाति ।  माधव -मतलब?  अविरल -जो सनातन सभ्यता के मार्ग पर चलते थे, वे थे मानव!  और जो सभ्यता संस्कृति को कुचलकर दूसरों को सताने में लगे रहते थे ,वह थे दानव! माधव-फिर वह दानव कहां गये? सब खत्म हो गये? अविरल - नहीं माधव यह दानव हर युग में पाए जाते हैं। इनका अंत करने  के लिए कभी राम को आना पड़ता है तो कभी कृष्ण को और कभी किसी अन्य महापुरुष को। महापुरुष से याद आया, मैंने सुना  है तुम्हारे विद्यालय के छात्र जनक पुरी के लिए कुछ तै...

एनसीईआरटी मल्हार कक्षा 6-पाठ- 1

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उत्तर -( क) (1)सिंधु  (2) सभी सही (ख) मेरी समझ से सभी कथन सही हैं क्योंकि कि हमारा देश भारत है ही इतना सुंदर जहां की प्राकृतिक छटा निराली है। जहां अन्न जल की कमी नहीं ।जहां हर तरह के वनस्पति है। जहां पवित्र नदियां , ,झरने बहते हैं। जहां उत्तर में भारत मां का मुकुट हिमालय है और दक्षिण में सागर चरणों को धोता है। जहां की धरती पर देवता भी अवतार लेते हैं। जिस धरती पर राम, कृष्ण ,गौतम , अवतरित होकर विश्व को सही रुप में जीने मार्ग दिखाते हैं। सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना सिखाते हैं।गलत का विरोध करना न्याय का पक्ष लेना, मानवता के मार्ग पर चलना सिखाते हैं। आ ओ मिलकर हल करें - शब्द ---------अर्थ या संदर्भ  1.हिमालय -भारत की सीमा पर फैली पर्वत श्रंखला। 2.त्रिवेणी -तीन नदियों (गंगा यमुना सरस्वती) की मिली  हुई धाराओं का संगम। जिसे प्रयाग कहते हैं ।(इलाह...

संपादकीय

मानव देह में जो स्थान मेरुदंड का है परिवार में वहीं स्थान नारी का है। नारी को यदि  घर परिवार, समाज और संसार रूपी गाड़ी की धुरी  कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी। वही है जो अपने परिवार की पाठशाला  में चाहे तो राम ,कृष्ण, राणा शिवाजी से अनमोल रत्न और सीता सावित्री दुर्गा सरस्वती जैसी मणियों   को समाज की माला में पिरो दें और देश का निर्माण कर देंऔर यदि परवरिश में चूक हो जाए तो दुर्योधन और दुशासन जैसे दुश्चरित्र कुपुत्र पैदा कर महाभारत कथा और संसार के विनाश का कारण बन जाए। इसी विचार और इसी चिंता के चलते विद्या भारती की परिकल्पना*सप्त शक्ति संगम* कार्यक्रमों का देश भर के सरस्वती विद्या मंदिर विद्यालयो में आयोजन हुआ । जिसमें सुषुप्तावस्था में विद्यमान नारियों की सात शक्तियों को पुनः जाग्रत करने सराहनीय प्रयास किया गया। हर्ष का विषय यह रहा कि अपने विद्यालय सरस्वती विद्या मंदिर कमला नगर आगरा में इसकी भव्य आयोजन चार श्रंखला रहीं जिसमें दो हजार विद्यार्थियों की माताओं की सहभागिता रही। आदरणीय दीदी रेखा चूड़ा समा विद्या भारती अखिल भारतीय संस्थान के शप्त शक्ति संगम की प्रभारी उत...

सृष्टि सर्जना शक्ति "नारी तू नारायणी"

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संसार की रचना दो तत्वों से हुई है एक है प्रकृति और दूसरा है पुरुष। अर्थात शिव और शक्ति। शक्ति के बिना शिव अधूरे। विचार किया जाय तो सृष्टि की सर्जना शक्ति में स्त्री तत्व का बाहुल्य है प्रधानता है। यथा - पंचमहाभूत में स्त्री तत्व का बाहुल्य है। इस शरीर का निर्माण जिन पांच तत्वों के संतुलित संयोजन से हुआ है वे हैं -पृथ्वी,जल ,आकाश,अग्नि,वायु। जिनमें तीन स्त्री दो पुरुष हैं।इसी प्रकार  पांच ज्ञानेन्द्रियों ,कर्मेंद्रियों में नाक ,आंख, त्वचा, जीभ, बुध्दि, वाणी, आदि भी स्त्री तत्व  प्रधान  हैं  मानव अंग  जीवन क्रिया , व्यवहार  विशेष में भी स्त्रीलिंग शब्द प्रधान है यथा- मूंछ, शिखा, वेणी, चोटी ठुडडी,भौंह,नाक,आंख,पलक,जीभ,बांह,टांग, अंगुलियां मुट्ठी,बुध्दि,वाणी, श्वास, धड़कन,  इज्जत, प्रतिष्ठा, बात,  चाल, जय ,पराजय, इच्छा  , आत्मा, सफलता ,विफलता,शक्ति ,सामर्थ्य, स्त्री  लिंग शब्द ही  हैं। संसार की संरचना, सृष्टि नारी से आरंभ नारी पर अंत। भारतीय संस्कृति और जीवन शैली स्त्री को ही सर्वोपरि रखकर चलती हैं तभी तो कहा जाता है-...