सृष्टि सर्जना शक्ति "नारी तू नारायणी"
संसार की रचना दो तत्वों से हुई है एक है प्रकृति और दूसरा है पुरुष। अर्थात शिव और शक्ति।
शक्ति के बिना शिव अधूरे।
विचार किया जाय तो सृष्टि की सर्जना शक्ति में स्त्री तत्व का बाहुल्य है प्रधानता है।
यथा -
पंचमहाभूत में स्त्री तत्व का बाहुल्य है।
इस शरीर का निर्माण जिन पांच तत्वों के संतुलित संयोजन से हुआ है वे हैं -पृथ्वी,जल ,आकाश,अग्नि,वायु। जिनमें तीन स्त्री दो पुरुष हैं।इसी प्रकार पांच ज्ञानेन्द्रियों ,कर्मेंद्रियों में नाक ,आंख, त्वचा, जीभ, बुध्दि, वाणी, आदि भी स्त्री तत्व प्रधान हैं मानव अंग जीवन क्रिया , व्यवहार विशेष में भी स्त्रीलिंग शब्द प्रधान है यथा- मूंछ, शिखा, वेणी, चोटी ठुडडी,भौंह,नाक,आंख,पलक,जीभ,बांह,टांग, अंगुलियां मुट्ठी,बुध्दि,वाणी, श्वास, धड़कन, इज्जत, प्रतिष्ठा, बात, चाल, जय ,पराजय, इच्छा , आत्मा, सफलता ,विफलता,शक्ति ,सामर्थ्य, स्त्री लिंग शब्द ही हैं।
संसार की संरचना, सृष्टि नारी से आरंभ नारी पर अंत। भारतीय संस्कृति और जीवन शैली स्त्री को ही सर्वोपरि रखकर चलती हैं तभी तो कहा जाता है- "तुम बिन यज्ञ न होवे, वस्त्र न कोई पाता।
खान पान का वैभव सब तुम से आता ।
जय लक्ष्मी माता।
कल्पना करें उस घर की जहां चार दिन के लिए घर की स्त्रियां किसी विवाह उत्सव आदि में शामिल होने के लिए चलीं जाएं और घर के पुरुष सदस्यों पति और बच्चों को घर की जिम्मेदारी सौंप जाएं तो क्या भूचाल आया है घर में। अन्नपूर्णा के अभाव में
भोजन कपड़ा मूलभूत सुविधाएं चरमराने लगती हैं। इसी लिए मुझे आरती की ये पंक्तियां मां लक्ष्मी के साथ -साथ गृह लक्ष्मी उपासना के लिए भी सटीक लगतीं हैं।हमारे तो धार्मिक अनुष्ठान यज्ञ आहुति भी सपत्नीक पूर्ण होते हैं। अर्धांगिनी के बिना तो देश भी आहुति स्वीकार नहीं करते हैं। शिव से पहले शक्ति का नाम लिया जाता है,राम से पहले सीता और नारायण से पहले नारायणी लक्ष्मी,श्याम से पहले राधा का। फिर भी बुद्धिजीवियों के मंच से बार बार स्वर उठते हैं स्त्री विमर्श के। स्त्री समानता के अधिकार के।
समझ नहीं आता कि जब उसे उच्च स्थान पहले से ही प्राप्त है तो उसे नीचे लाकर बराबरी के अधिकार से मिलेगा क्या? कुछ एक विसंगतियां है भी तो वह हर क्षेत्र में हैं।किसी समस्या का समाधान दूसरी समस्या पैदा कर देना बुद्धिमत्ता तो नहीं कहलाएगी।
मेरी समझ में तो यही आता है कि इसमें कम्युनिस्ट विचारधारा का एक गहरा षड्यंत्र है भारतीय समाज की परिवार व्यवस्था को तोड़कर देश को तोड़ने का, और अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने का। क्योंकि भारतीय मजबूती का मूल आधार परिवार है। सचेत और सावधान रहना होगा इन षड्यंत्रकारी शक्तियों से, और मुंहतोड़ जवाब देना सीखना होगा परिवार की धुरी मातृशक्ति को। इस मातृशक्ति को श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित सात शक्तियों को जागृत करना होगा जो आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं सुषुप्ति की अवस्था में छिपी हुई हैं।
स्त्री की यह साथ शक्तियां हैं -"कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति, क्षमा।"
कीर्ति यानी कुटुंब का यश और मान का भान। उचित अनुचित का बोध दो -दो कुलों का मान सम्मान बढ़ाने की शक्ति और उसकी संतान में हस्तांतरण। जो मातृशक्ति के हाथ में ही है। अपनी संतान में सीता, सावित्री, जीजाबाई, राम कृष्ण, ध्रुव,प्रहलाद, शिवाजी, राणा,
के संस्कार डालकर संतान को पुष्पित पल्लवित करना ।संवेदनशील और साहसी बनाना ।सद्गुणों का विकास करना ।मोबाइल के मोह को त्यागकर उसका सदुपयोग और सद्ग्रंथ की ओर प्रेरित करना। अपने धर्म जीवन मूल्यों , उपासना विधि ,प्रतीकों पर अडिग आस्था, विश्वास के साथ व्यावहारिक, नैतिक, वैज्ञानिक पक्ष की समझ विकसित करना। पर्यावरण चेतना जागृत करना।
श्री शक्ति के अंतर्गत -ईमानदारी और परिश्रम से युक्त विद्या और धनोपार्जन की कला सीखना सिखाना मितव्ययिता और समझदारी से घर चलाना संतोषी भाव विकसित करना। स्व के साथ सब का विकास और राष्ट्र का उन्नयन सर्वोपरि रखना।
वाक शक्ति के अंतर्गत -बुध्दि में हिम की शीतलता और वाणी में शहद की मिठास से परिवार को जोड़कर चलना वाक्चातुर्य से विघटन कारी शक्ति को परास्त करना।न्याय का पक्ष लेना।
स्मृति शक्ति के अंतर्गत - ध्यान की धारणा शक्ति प्रयोग करके छोटी से छोटी सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों संस्कार,परम्परा, रीति-रिवाज, नीति, कुल धर्म,का निर्वहन क्रियान्वयन और हस्तांतरण करना।
मेधा के अंतर्गत -निर्णय शक्ति परिवार समाज देश के उत्थान के लिए निर्णय ले सही सके। सही विचार प्रेषित कर सके। जो भारत को बौद्धिक और शारीरिक क्षमताओं के बल पर विश्व गुरु बना सके। जिसे ध्यान रहे कि यह भारत हिंदुत्व परिवार में हिंदू समाज दीपक है और आप उस दीपक की ज्योति हैं। जो बुझने न पाए। कोई भी विधर्मी यदि हमारे मंदिर के दीपक में फूंक मार कर बुझाने का प्रयास करें उससे पहले ही अपनी समझदारी भरे संस्कारी हाथों की ओट तैयार रहे। ताकि कोई शालिनी काला बोरा पहनने के लिए मजबूर न हो । उसके कदम बहके नहीं और बहककर टुकड़े-टुकड़े कट कर फ्रिज में रखने को तैयार ना हो ।जो राक्षसों की थाली का भोजन ना बन जाए।
यह ध्यान रहे कि हम पन्नाधाय और काली की संतान है जो अपनी आन मान और देशधर्म की रक्षा के लिए बलिदान देना भी जानती हैं और बलि लेना भी । बेटा हो या बेटी दोनों का जन्म से ही अपने धर्म के प्रति अडिग रहने देश धर्म संस्कृति सनातन सभ्यता के लिए मिटने और मिटाने की निर्णय और साहस शक्ति हमें बूंद बूंद घुट्टी के रूप में पिलानी होगी ।शेर और सूअर के बीच का अंतर समझना होगा ।यही हमारी मातृ शक्ति का कर्तव्य है।
चौथी शक्ति जिसे धृति यानी धैर्य कहा जाता है। धरती जैसी सहनशक्ति जहां सीखी जाती है संस्कारों की फसल। जो हमें सिखाती है कठिन परिस्थितियोंम घबराना नहीं। धैर्य पूर्वक सोच समझकर निर्णय लेना और अपनी संतानों को भी यही सिखना।
अंतिम और पांचवी शक्ति है क्षमा यानी परिवार व्यवस्था को चलाए रखने के लिए एकजुट रहना क्षमा के आधार पर ही परिवार एक जुट होता है और क्षमा को हृदय में धारण करने के लिए क्रोध का त्याग करना होगा। परंतु क्षमा का अर्थ यह बिल्कुल नहीं की गौरी को 16 बार छोड़कर पृथ्वीराज का बलिदान दे दिया जाए। इसका अर्थ है *
अमर्यादित आचरण वाले लोभी लालची व्यभिचारी को श्री कृष्ण की गीता के उपदेश के अनुसार दण्ड देकर न्याय और धर्म का पालन करना।
ये पांच विषय ही स्त्री विमर्श का विषय होना चाहिए।बात होनी चाहिए परिवार की धुरी में सात शक्तियों के ग्रीस लगाने की।
स्त्री न कभी कमजोर थी न है न होगी।
वह जननी थी है और रहेगी।
वह श्रेष्ठ थी है और होना भी चाहिए।
सूरज उदय को रोक दें ऐसी थी नारियां।
ऐसी थी नारियां मेरे भारत की नारियां।
बात होनी चाहिए स्त्री के गौरवपूर्ण मर्यादित भूत, वर्तमान और भविष्य की।
बात होनी चाहिए भारतीय आचरण की, स्वदेशी बोध की । बात होनी चाहिए अमर्यादित आधुनिकता की अंधी दौड़ के प्रतिकार की और सद्बुद्धि पूर्ण वेशभूषा आचरण की।
*पंच परिवर्तन* - *कुटुम्ब प्रबोधन*, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता,स्वदेशी आचरण,
नागरिक कर्तव्य,
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