मंगल भवन अमंगल हारी

लेखन एवं संयोजन निर्देशन
सरला भारद्वाज 



नाटक मंगल भवन अमंगल हारी


 प्रथम दृश्य  -

(मंच पर माधव का प्रवेश )

माधव- भैया ओ भैया

अविरल--हां माधव बोलो! 

माधव -आज क्लास में सर ने एक चैप्टर पढाया और बताया की अंग्रेजों ने भारत को जातियों मे बांट कर आपस में लड़ाया।

क्या यह बात सच है भैया?

अविरल -हां बेटा बिल्कुल सच है, 

भारत में यह जातियां पहले नहीं  थी,  केवल कर्म था। जातियां तो बस दो ही थीं।वह थीं सभ्यता के आधार पर,!

माधव- कौन कौन सी जातियां?

अविरल -बस दो ही जातियां  थीं यह थी  मानव  जाति और दानव जाति ।

 माधव -मतलब?

 अविरल -जो सनातन सभ्यता के मार्ग पर चलते थे, वे थे मानव!

 और जो सभ्यता संस्कृति को कुचलकर दूसरों को सताने में लगे रहते थे ,वह थे दानव!

माधव-फिर वह दानव कहां गये? सब खत्म हो गये?

अविरल - नहीं माधव यह दानव हर युग में पाए जाते हैं। इनका अंत करने  के लिए कभी राम को आना पड़ता है तो कभी कृष्ण को और कभी किसी अन्य महापुरुष को।

महापुरुष से याद आया, मैंने सुना  है तुम्हारे विद्यालय के छात्र जनक पुरी के लिए कुछ तैयारी  कर रहे हैं?

माधव - हां भैया, हमारे स्कूल में मंगल भवन अमंगल की तैयारी चल रही है ।आज उसकी प्रस्तुति है।

माधव -अच्छा ! चलो तो फिर देखने चलते हैं। आनंद आएगा।

 माधव -हां चलो भैया ,चलो!


दूसरा दृश्य -

अंशुल -नौमी तिथि मधुमास पुनीता।शुक्ल पक्ष

 अभिजित हरि प्रीता।।

 अंशुल -चौपाई - मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहु सु दसरथ अजिर बिहारी!

( राजा दशरथ कौशल्या और बालक राम मंच पर  )

सम्लित स्वर- बधाई हो महाराज बधाई हो  एक नहीं दो नहीं चार चार राजकुमारों की किलकारियां महल में गूंज रही हैं। बधाई हो।

 राजा -सच ?आज हम बहुत प्रसन्न हैं ,लो, लो, उपहार!

सम्लित स्वर- में  गीत -

जन्मे हैं राम रघुराइया अवध में बाजे बधैया 2

बजे बधाइयां हो बजे बधाइयां 

जन्मे है राम रघुरइया अवध में बाजे बधाइयां।

राजा लुटावैं हीरा और मोती, रानियां लेते बलैया ,अवध में बाजै बधैया।

राम लक्ष्मण भरत शत्रुहन, अंगना में खेले चारों भैया 

अवध में बजे बधाइयां। 

अवधपुरी में धूम मची है भीड़ बड़ी अंगनयिया अवध में बजे बधाइयां।

  यश -माता कौशल्या -अरे !अरे! अरे! लल्ला ।मेरा प्यारा राम  आज ठुमक ठुमक चलत  है।

 देखो तो महाराज!अरे! अरे !अरे !

आजा !आजा!


सम्लित स्वर- गीत 

ठुमक ठुमक चलें राम, बाजै पैजनियां!2

बाजे पैजनियां,बाजै पैजनियां,

माता कौशल्या के धाम, बाजै पैजनियां।

*राम सलोने की उतारू में नजरिया, होले होले से चले लचके कमरिया।

देखे है, देखे हैं दुनिया तमाम ।

बाजे पैजनियां।

गूंजा कौशल्या जी का धाम बाजै पैजनियां।

प्यारे हैं , प्यारे बड़े राम रमैया, राम रमैया लखन जी  के भैया।

प्यारे हैं प्यारे बड़े राम रमैया।संग चलत तीनों छोटे छोटे भैया।

करते हैं सब को प्रणाम।

बाजे पैजनियां।


  अंशुल -चौपाई - प्रात काल उठिए करें रघुनाथा ,

मात पितहि गुरु नावहिं माथा।


 चारों -माता जी प्रणाम,पिताजी प्रणाम।

गुरुदेव प्रणाम ।

 माता पिता -यशश्वी भव ।आयुष्मान भव।


 अंशुल -गुरु गृह पढन चलें रघुराई,अल्प काल में विद्या आई।

शस्त्र शास्त्र धारण करि लीन्हे। गुरु वशिष्ठ ने आशिष दीन्हे।


 संस्वकार वशिष्ठ -हे राजन अब ये चारों राज कुमार शस्त्र और शास्त्र में पूरी तरह पारंगत हो गये है।आप इन्हें अयोध्या ले जा सकते हैं।

 राजा -जो आज्ञा गुरुदेव।

 रानी -आरती थाल सजाओ सखियों,मंगल कलश भराओ,

राज कुंवर घर वापस आएं,मंगल मोद मनाओ।


द्वारपाल - ---महाराज की जय हो!

महाराज इस समय द्वारै पर मुनि विश्वामित्र पधारे हैं,

  कुछ कुपित हृदय से  लगते हैं,या फिर विपदा के मारे हैं।


 सूत्रधार -अशुल

मुनिवर के सत्कार को चल दिए कौशल नाथ,

संग लिए महारानियां, चारों बालक साथ


राजा  -अच्छा चलो शीघ्र ही उनके स्वागत को।

सार्थक-चरण पखारू आपके,वंदन बारंबार,


धन्य हुए हम आज सब,करी जो कृपा अपार,

करी जो कृपा अपार,

क्या आदेश आपका , 

तन मन धन सम्पदा सकल ,सब कुछ है आपका।


 विश्वामित्र -हे राजन-

मैं यज्ञ जिस समय करता हूं,

दुख मुझको निषिचर देते हैं।

पूजा सामग्री हवन कुंड, सब नष्ट भ्रष्ट कर देते हैं।

असुरों के अत्याचारों से, अकुलाया हूं, घबराया हूं।

दो राम लखन रक्षक मुझको, बस यही मांगने आया हूं।


 राजा-मुनिवर ये अभी बालक हैं युद्ध का अनुभव इन्हें कहां ,आप मुझे आदेश करें मैं चलता हूं।

दस अक्षोणी सेना दे दूं,और स्वयं चलूं   संग रथ लेकर ,

नादान अभी हैं राजकुवर, क्या पाएंगे इनको लेकर।


विश्वामित्र -बस राजन या तो मना करो या इनको भेजो साथ।

जिनको तुमने बालक समझा, दीनों के दीनानाथ।


राजा  सार्थक-जो आज्ञा  मुनिवर 

- हे राम !हे लक्ष्मण !

तुम दोनों यज्ञ की रक्षा हेतु गुरु जी के साथ जाओ।


दोनों -जो आज्ञा पिताजी,

प्रणाम।

राजा-विजयी भव!

(अट्टहास का स्वर)


 विश्वामित्र -सावधान राम ! सावधान लक्ष्मण!


इस भूमंडल पर नित ही,

 आसुरी शक्तियां बढ़ती हैं।

भक्षण करती हैं रक्त मांस,

माया जालों को रचतीं हैं।,


देखो वह काली परछाई,ताडका है असुरों की माई

अनगिनत हैं इनकी संतानें विध्वंस यज्ञ को करतीं हैं 

विध्वंस यज्ञ को  करते हैं,नित पाप घड़े को भरते हैं।


क्षण में इनका संहार करो,

धरती माता का भार हरो!

रघुकुल के कुल भूषण रघुवर,अब संतों का संताप हरो!


 राम -जो आज्ञा  सावधान, इस वन के रक्षक हम हैं। यहां पापियो का कोई स्थान नहीं ।

 सूत्रधार अंशुल -एकहिं बान प्राण हरि लीन्हे।निशिचर दूरि फैकि प्रभु दीन्हे।

फैं क दिए सौ कोस जो,फूटे भा ल कपार,

 बजी दुंदुभी गगन में , बरसहिं सुमन अपार।

बरसहिं सुमन अपार ,

देवगन  नाम उचारे,

हिरदय हरस अपार ,जयति जय जय सब गावै।


हेतराम आपकी जय हो जय हो।


 सब -रघुकुल में सूर्य समान हो तुम हे राम तुम्हारी जय होवै।2

रघुकुल में सूर्य समान हो तुम हे राम तुम्हारी जय होवे,

असुरों के लिए कृशानु हो तुम हे राम तुम्हारी जय होवे,


गो द्विज महिसुर संतों के हित,

नर तन में प्रगटे त्रिभुवन पति,

नर हो कर भी निर्वाण हो तुम हे राम तुम्हारी जय होवे,

संदेश - सूर्यांश-

क्या सोच रहे हैं आप? कार्यक्रम आगे बढ़ाए?

होगा क्या?

देखेंगे ताली बजाएगें, रावण जलाएंगे,घर चले जाएंगे ।जाएंगे।क्या हम अपने भीतर के राम को नहीं जगा सकते?

क्या हम समाज में व्याप्त पापाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार का अंत करके राम के वंशज नहीं कहला सकते?

न तो रावण मरा है न खर दूषण।

खर का अर्थ होता है गधा,और दूषण का अर्थ है गंदगी।देश को पतन की ओर ले जाने वाले मूर्ख कुटिल बुद्धि मानसिकता के ख र दूषणों को पहचानिए।देश को सुधारने आगे ले जाने की जिम्मेदारी केवल शिक्षक, प्रशासन एवं धर्म गुरुओं की ही नहीं हम सब की है।भावी पीढ़ी को राम कृष्ण के आदर्श कौन सिखाएगा , कृष्ण की बांसुरी के साथ सुदर्शन और धनुष-बाण का मर्म भी समझिए। भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने में गिलहरी सा योगदान करिए।

तभी सार्थक होगी ये चौपाई, मंगल भवन अमंगल हारी,

मंगल करिए अमंगल को चुन चुन  धूल चटाइए।

जय सिया राम!

भारत माता की जय!









 





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