कर्म प्रधान विश्व रचि राखा

गुरु से कपट मित्र से चोरी(हेराफेरी)
या हो अंधा या हो कोढ़ी।।
कर्म का फल जाता नहीं , सुदामा के एक मुट्ठी चने की हेराफेरी ने  ही जीवन भर की दरिद्रता दी , जबकि परम ज्ञानी परम भक्त तत्ववेत्ता थे। 
साधारण मनुष्य कर्म फल से पीछा कैसे छुड़ा सकता है? फिर भी मनुष्य हेराफेरी से बाज़ नहीं आता है। अपनी मूर्खता और अज्ञानता को बुद्धिमानी समझ नित हेराफेरी कर जीवन पर बोझ बढ़ाता जाता है।
स्वर्ग हो या नर्क सब यहीं है।  
कर्म प्रधान विश्व रुचि राखा ।।
जो जस करहि,
सो तब फल चाखा।।
अतः सन्मार्ग का ही अनुसरण करना जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।

क्यों कि जैसा खाओगे अन्न,
वैसा होगा मन।
जैसी होगी शुद्धि,
 वैसी होगी बुद्धि।
जिस तरह एक सड़ा हुआ फल पूरी पेटी के फलों को सड़ा देता है, ठीक उसी तरह गलत ढंग से कमाया  या बचाया हुआ एक रूपया भी किसी न किसी तरह बर्बादी की ओर खींच ले जाता है और लाखों  का धन डुबा देता है और फिर लोगों को कहते सुना है न जाने ईश्वर हमें क्यों कष्ट दे रहा है ?हमने तो कुछ किया नहीं। जबकि मूल में कारण सिर्फ और सिर्फ होता है संचित कर्मों का परिणाम, जिसे ज्ञानी प्रारब्ध कहते हैं।
कर्म फलों की मूल और ब्याज जब अधिक बढ़ जाती है तो अगले जन्म तक किसी न किसी रुप में चुकानी पड़ती है।
इस लिए नीयत साफ रखो,बरकत खुद होगी। 
किसी सच्चे की आत्मा को न दुखाओ,आह न लो किसी की।
आंसू न दो किसी की आंखों में।
किसी का धन वस्तु स्त्री को देखते ही लार न टपकाओ । परिश्रम से कमाओं और खर्च करो।जिसने जीवन में सहयोग के लिए हाथ बढ़ाया हो उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखो।अपना व्यवहार मधुर रखो, क्यों कि जो हम देते हैं वहीं वापस मिलता है।
किसी की एक कौड़ी भी उधार न रखो।खरा व्यवहार रखो। सत्कर्म और सन्मार्ग ही सुख शांति पूर्ण जीवन का आधार है।
इसके विपरीत चलने वालों को जीवन में  कर्म फल भोगते देखा है,
फिर डाक्टरों, ज्योतिषियों, मंदिरों के चक्कर काटते देखा है । 
मंदिर में दीपक जलाने से कष्ट कटते हैं, पर तब जब उस दीपक के प्रकाश से अंतस के तमस को मिटाने का संकल्प लिया जाए।

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