पहले अपने घर की सफाई आवश्यक




 इस नवरात्रि में भारतवर्ष में स्वयंसेवकों  का डंका बज रहा है। क्योंकि आने वाली विजया दशमी को संघ का सौ वां स्थापना दिवस है।

देश निर्माण और उत्थान हेतु आयोजन हो रहे हैं और लिए जा रहे हैं विविध संकल्प। पर विचारणीय यह है कि राष्ट्र की  सबसे पहली 

इकाई है व्यक्ति ,जिनसे परिवार और परिवारों से राष्ट्र का निर्माण होता है। राष्ट्र निर्माण की एक कड़ी है -"सप्त शक्ति संगम,,"।गीता के दशवें अध्याय का 34 वां श्लोक इसकी सूक्ति है।जो इस प्रकार है-

"कीर्ति श्रीवाक च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृति क्षमा।"

भगवान श्री कृष्ण ने नारियों की सात शक्ति बताईं है-

1.- कीर्ति (यश, गरिमा,महिमा)

2.श्री  (लक्ष्मी-परिवार में सदाचार युक्त पुरुषार्थ से धनोपार्जन और संचयन)

3. वाक-(परिवार जोड़ने के लिए  स्नेह युक्त ,संयमित ,उचित, विनम्रता पूर्ण वाक्चातुर्य पूर्ण भाषा का प्रयोग।)

4.स्मृति-(छोटी से छोटी बात संस्कार रीति नीति परम्परा को याद रख संस्कृति को संवहन और परिमार्जन की शक्ति)

5-मेधा-(धारणा शक्ति,समझ, तर्कनिष्ठता, संश्लेषण विश्लेषण परिणाम बोध)

6.धृति-(धैर्य ,सहनशीलता, दृढ़ता)

7.क्षमा(स्वयं के हृदय में क्लेश न उत्पन्न होने देना, उदारता पूर्वक क्षमा करने का सद्गुण)

इन सात शक्तियों के समन्वय से होती है श्रृष्टि।नारी को अपने घर संसार को सुचारू रूप से चलाने के लिए ये सात सद्गुण घोलने होते हैं अपने व्यवहार में चरित्र में। जहां ये नहीं वहां क्लेश और तमाम झंझट जीवन में प्रवेश। जिनमें ये सभी सद्गुण हैं वे ही पथ-प्रदर्शक होनी चाहिए इस आयोजन की। विचारणीय यह है कि सभी के घरों  में है ऐसी सद्गुणी विदुषियां? मेरे कटु अनुभव में तो ये आया है कि सालों  इस तरह के वर्ग करने वालीं ऊपर से ओढ़े हुए चोगें के पीछे भयंकर विद्रूपताओं का अंबार लिए है।  सर्वप्रथम आयोजकों को  देशभर में संस्कार की झाड़ू लगाने के स्थान  पर अपने घर की सफाई पहले करनी चाहिए। अन्यथा इसके अभाव में इस श्लोक से "ल" लुप्त होने की स्थिति में "शोक"शेष बचता है। 

"अन्यथा आगे नहीं तो पीठ पीछे विद्वान कहेंगे ही-

"पर उपदेश कुशल बहुतेरे,जे आचरहिं थे नर न घनेरे।"

अपनी बहन बेटियों को अवश्य सिखाए ये सद्गुण।

मैं स्वयं अपनी ही बात करूं तो  इस श्लोक का सातवां गुण क्षमा मुझमें नहीं।छ शक्ति चरमावस्था में हैं।पर सातवीं  का क्या करूं? अनजाने में हुई भूल,और फिर उस भूल का एहसास करने वाले को तो क्षमा कर पाती हूं पर योजनाबद्ध तरीके से किए गये आपराधिक व्यवहार,और अपमान को भूलना भी चाहूं तो नहीं भूले पाती  चाणक्य परिवार से हूं।स्मृति और मेधा जो प्रबल है। ,ऐसे में क्षमा का द्वार बंद रहता है, प्रवेश कैसे करें हृदय में?एक बार जो नजर से गिरा उसे उठाने का सद्गुण नहीं मुझमें। मूल्यों की अवमानना सहन ही नहीं होती । कहें तो छटवां गुण भी नहीं "धृति " यानी  सहनशीलता कम है। इस स्थिति में बुद्धि बार बार प्रश्न पूछती है कि जब स्वयं के दीपक में तेल कम है तो दूसरों से कैसे कहा जाय कि अपने दीपक की ज्योति ठीक करो,तेल बढ़ाओ उसमें। इस पुनीत कार्यक्रम के लिए क्या मैं उचित हूं?कैसे निर्वहन करूं इस दायित्व को श्लोक की पूर्णता के अभाव में? हां मैंने देखा है हजारों को उपदेश करने वाले कुछ महापुरुषों को जो व्यवहार और चरित्र की परिभाषाओं का आलाप लगाते हैं पर स्वयं की  मूर्ख जिद्दी षड्यंत्र कारी अनियंत्रित आचरण वाली संतानें जो अपने ही परिवार के मान सम्मान, यश, कीर्ति , वैभव की धज्जियां  उड़ातीं हैं। लाखों के पैर धोने वाला खुद के पैर न धो सके तो विडम्बना ही लगता है। अतः प्रत्येक को पहले अपने घर से प्रारंभ करना चाहिए हालांकि सीखना एक कला है सीखने वाला बचपन में ही सीख लेता है और कुछ बडी बडी डिग्री लेकर भी नहीं सीख पाते। जैसे कि मैं" स्वयं "।इसके पीछे मेरी परवरिश का दोष भी हो सकता है।माता पिता ने धमनियों में राम ,कृष्ण, शिवाजी, लक्ष्मीबाई को बहा दिया है , पृथ्वीराज चौहान को नहीं बहाया। अन्यथा सातवें सद्गुण को भी समाहित कर लेती चरित्र में।अब तो ईश्वर से यही कामना है इस जन्म  में न सही अगले जन्म में पूर्णता प्रदान करना ।अन्यथा केवल इस संसार से  मुक्ति और मोक्ष देना। क्यों कि लगता है या तो ये संसार मेरे लायक नहीं या में इस संसार के लायक नहीं।

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सरला भारद्वाज 

जय सिया राम।



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