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लखनवी अंदाज़ यशपाल 10th क्षितिज

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पाठ सारांश लखनवी अंदाज इस पाठ के लेखक यशपाल जी हैं। इस पाठ में यशपाल जी ने खोखली शान   दिखाने वाले लोगों पर व्यंग किया है ।लेखक को यात्रा करनी थी। उसने यह सोच कर कि सेकंड क्लास के डिब्बे में मुझे एकांत मिलेगा और मुझे नई कहानी लिखने का मौका मिल जाएगा मैं कुछ सोच सकूंगा कुछ विचार कर सकूंगा यही विचार करके उसने सेकंड क्लास का टिकट खरीदा। लेकिन जैसे ही वह ट्रेन के डिब्बे में दाखिल हुआ तो उसकी आशा के विपरीत वहां एकांत न था वहां पहले से ही एक सफेदपोश नवाब साहब बर्थ पर पालथी मारे बैठे हुए थे ।लेखक के डिब्बे में कदम रखते ही नवाब  साहब ने अपनी आंखें फेर ली और खिड़की से बाहर की ओर देखने लगे। उनके चेहरे और हाव-भाव से लग रहा था कि उनकी एकांत दुनिया में खलल पड़ गई है ,और लेखक का डिब्बे में आना उसे अच्छा नहीं लगा लेखक का भी अपना स्वाभिमान था। उसने भी सोचा यह व्यक्ति मुझसे बात नहीं करना चाहता तो मैं भी क्यों पहले से बात करूं परंतु आखिर चुप्पी कब तक रहती चुप्पी टूटी। नवाब साहब ने लेखक से पूछा विला खीरे का शौक  फरमाइए । अर्थात खीरा खाने का आग्रह किया। लेकिन लेखक ने स्वाभिमान की रक...

बाल गोविंद भगत रामवृक्ष बेनीपुरी10th क्षितिज

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पाठ सारांश पाठ के सारांश को निम्न बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है- 1.बालगोबिन भगत का व्यक्तित्व बाल गोविंद भगत मझोले कद के गोरे चिट्टे आदमी थे ।60से ऊपर की उनकी उम्र थी सिर के बाल पक चुके थे। कमर में एक लंगोटी और सिर पर कबीरपंथी कनपटी टोपी पहनते थे । जाड़े में काली कमली ओढ़ते थे ।मस्तक पर रामानंदी तिलक लगाते थे ।गले में तुलसी की माला पहनते थे। बालगोबिन भगत साधु भी थे और गृहस्थी थे ।उनका एक बेटा था और एक बहु थी।  उनके साथ रहते थे खेती-बाड़ी में काम करते थे। 2. सच्चे साधु बालगोबिन भगत वास्तव में सच्चे साधु थे। परिवार वाले होते हुए भी वह साधुओं जैसा जीवन जीते थे। कबीर को अपना साहब मानते थे। उन्हीं के गीतों को गाते थे। उन्हीं के जीवन आदर्शो पर चलते थे। खरा  व्यवहार करते थे। बिना किसी से पूछे किसी की चीज न लेते थे यहां तक कि दूसरे के खेतों में शौच तक न जाते थे। जो कुछ खेत में पैदा होता था उसे अपने घर से 4 कोस दूर ले जाकर कबीरपंथी मठ में अपने साहब के दरबार में अर्पण करने जाते थे  जो कुछ प्रसाद के रूप में बचता था उससे अपना गुजारा चलाते थे। 3. बाल गोविंद भगत का ...

वाच्य का अर्थ प्रकार और पहचान और प्रयोग कृत वाच्य कर्मवाच्य भाववाच्य

**https://youtu.be/p0vvJUhXBS4वाच्य https://youtu.be/p0vvJUhXBS4 किसी भी बात को कहने का तरीका या ढंग वाच्य कहलाता है। हर एक व्यक्ति का बात कहने का अपना-अपना  ढंग या तरीका होता है हिंदी भाषा में बात को दो या तीन तरह से कहा जाता है ।यह कहने का ढंग ही वाच्य कहलाता है वाच्य के तीन भेद हैं । 1. कर्तृवाच्य ।  2 .कर्म वाच्य । 3 .भाव वाच्य।   कर्तृ वाच्य जिन वाक्यों में कर्ता की प्रधानता होती है वह कर्तृवाच्य कहलाते हैं। जैसे चिड़िया उड़ रही है।  बच्चे निबंध लिख रहे हैं । बालक बिस्तर पर सो रहा है । बच्चे घर जा रहे हैं। वाक्यों में कर्ता की प्रधानता है, कर्तृवाच्य हैं। कर्मवाच्य जिन वाक्यों में कर्म की प्रधानता होती है, वे कर्मवाच्य होते हैं।  इसकी प्रमुख पहचान है इन वाक्यों में के द्वारा जुड़ा होता है।  जैसे -चिड़ियों के द्वारा उड़ा जाता है । बच्चों के द्वारा घर जाया जाता है।  बच्चे द्वारा निबंध लिखा जाता है । बालक के द्वारा बिस्तर पर सोया जाता है । सब लोगों के द्वारा अखबार पढ़ा जाता है। भाव वाच्य जिन वाक्यों में भाव की प्रधानता होती ...

"पदपरिचय "यह टॉपिक है, व्याकरण का बाप, तो जरा ध्यान से पढ़ें

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पद परिचय का अर्थ- पदों का व्याकरणिक दृष्टि से परिचय देना पद परिचय कहलाता है अर्थात पद का अर्थ होता है शब्द, शब्दों का परिचय देते समय यह स्पष्ट करना  कि शब्द संज्ञा है सर्वनाम है या क्रिया या विशेषण है उसका वचन लिंग पुरुष काल आदि क्या है इन सब का परिचय देना पद परिचय कहलाता है। जैसे-भारत की राजधानी दिल्ली है। इस वाक्य में यदि हम दिल्ली शब्द का परिचय दें तो दिल्ली व्यक्तिवाचक संज्ञा है स्त्रीलिंग है एकवचन है। राजधानी विशेषण है और विशेषण का विशेष्य भी है दिल्ली। इस प्रकार शब्दों का परिचय देना पद परिचय कहलाता है पद परिचय पढ़ते समय ध्यान रखने योग्य बिंदु- पद परिचय विषय अपने आप में पूरी व्याकरण को समेटे हुए हैं देखने में तो यह शब्द छोटा लगता है परंतु पूरी व्याकरण के विषय बंधु इसमें समाहित रहते हैं अतः इसे पढ़ते और समझते समय हमें निम्नलिखित बिंदुओं का अध्ययन करना होता है या उन्हें ध्यान में रखना होता है जो हम विभिन्न कक्षाओं में पढ़ते चले आए हैं उनका विवरण इस प्रकार है।    जिन पदों का हमसे परिचय पूछा जा सकता है वह व्याकरण के बिंदु निम्न प्रकार हैं. 1.संज्ञा  2.सर्वनाम...

कबीर की साखियां और सबद सस्वर पाठ ,भावार्थ , प्रश्न उत्तर अभ्यास

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1.मानसरोवर सुभर जल हंसा के लि कराहि                    मुक्ता फल मुक्ता चुगे अब उड़ी अंत न जााहि। भावार्थ मन रूपी सरोवर में आत्मा रूपी हंस विचरण कर रहा है जिसे मुक्ति रूपी मोती चाहिए मुक्त रूपी मोती प्राप्त होने के बाद वह कहीं अन्यत्र नहीं जाना चाहता उसे मुक्ति रूपी मोती प्राप्त हो चुका है। 2.पखा पाखी के कारने ,सब जग रहा भूलान। निरपख होय के हरी  भजै, सोई संत सुजान। भावार्थ पूरा संसार पक्ष और विपक्ष के चक्कर में पड़ा है ,ईश्वर और अल्लाह के चक्कर में पड़ा है। परंतु वास्तव में सच्चा संत वही है जो निष्पक्ष होकर ईश्वर का भजन करता है ।मानवता में ईश्वर को तलाशता है। 3.हस्ती चढिए ज्ञान को, सहज दुलीचा डार।  स्वान रूप संसार है  भूखन दे झक   मार। भावार्थ कबीरदास जी यहां ज्ञानी को ज्ञान रूपी हाथी पर सवार होने की सलाह देते हैं ,और कहते हैं कि यह संसार कुत्ता रूपी है ।जो ज्ञानियों पर भोंकता रहता है  ।हाथी अपनी चाल चलता है कुत्ता अपना भोंकता है, इसलिए ज्ञानियों को संसार के भौंकने की चिंता नहीं करनी चाहिए ...

बसंत भाग 2 पाठ 4 कठपुतली कविता पाठ एवं प्रश्न उत्तर अभ्यास

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                                     कविता कठपुतली गुस्से से उबली।  बोली ये धागे  क्यों हैं ,मेरे पीछे आगे? इन्हें तोड़ दो मुझे मेरे पावों पर छोड़ दो । सुन कर बोलीं पर और और कठपुतलियां कि  हां, बहुत दिन हुए हमें अपने मन के छंद छुए। मगर.... पहली  कठपुतली सोचने लगी, ये कैसी इच्छा मेरे मन में जगी? शब्दार्थ गुस्से से उबली- गुस्सा में भर कर बोली मुझे मेरे पांवपर छोड़ दो -मुझे स्वतंत्र कर दो मन के छंद छुए-अपने मन की इच्छाएं पूरी किए हुए   क्रिया कलाप- कठपुतली निर्माण,और कहानी निर्माण तमाशा प्रदर्शन प्रश्न .1. कठपुतली को गुस्सा क्यों आ रहा था? उत्तर . कठपुतली को गुस्सा इसलिए आ रहा था क्योंकि लोगों ने उस उसे धागों में बांध रखा वह स्वतंत्र नहीं थी वह कोई भी अपना काम अपनी मर्जी से नहीं कर पा रही थी लोग उसे अपने इशारों पर नचा रहे थे इसलिए उसे गुस्सा आ रहा था। प्रश्न  2.कठपुतली अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी परंतु फिर भी वह अपने पैरों पर ...

8th classलाख की चूड़ियां पाठ 2. बसंत भाग3

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पाठ सारांश लेखक को अपनी नानी के गांव जाना बड़ा पसंद था। जब वह छोटा था तो अपनी नानी के गांव बड़े चाव से जाता था ।उसके नानी के गांव में एक बबलू नाम का मनिहार रहता था ।जो लाख की चूड़ियों का व्यवसाय करता था ।लेखक बदलू के पास जाकर बहुत घंटों बैठा रहता था क्योंकि वहां लाख की चूड़ियों से बची हुई लाख   से बदलू बच्चों के खेलने के लिए रंग बिरंगी गोलियां बना देता था।लेखक बदलू को मामा न कहकर काका कहता था क्योंकि गांव वाले सभी बच्चे बदलू को काका ही कहते थे। लेखक बदलू के पास मचीया पर बैठा रहता बदलू उसे खाने को आम देता और गाय का दूध पीने को देता बड़े प्यार से लार से वह लेखक से बात करता लेखक को उसके पास बैठना बहुत अच्छा लगता था । चूड़ियां बनाता तो लकड़ी की बेलनाकार लकड़ी पर चूड़ियों को पहनाकर ऐसे देखा जैसे कोई नई नवेली दुल्हन को चूड़ी पहना रहा हो।गांव भर के लोग उससे चूड़ियां खरीदकर पहनते थे शादी और विवाह के समय बदलू के बड़े भाव बदल जाते थे वह लोगों से दोगुने दाम लेता था ने नेग मानता था क्योंकिलाख की चूड़ियों का जोड़ा सुहाग का प्रतीक माना जाता है था परंतु कुछ समय कांच की चूड़ियां बनना शुरू...