तुलसी दास कवितावली और लक्ष्मण मूर्छा

1. पहला पद (कवित्त): "किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिकारी, भाट..."
मूल पंक्ति:
किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिकारी, भाट,
चाकर, चपल नट, चोर, चार, बेटकी।
पढत, गुनत, चढत गिरि, अटत गहन गन अहन अहेतकी।
ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम करि,
पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटी।
तुलसी बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें,
आगि बडवागि तें बडी है आगि पेट की॥

प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियों में तुलसीदास जी ने अपने युग की भीषण भुखमरी और पेट की अग्नि शांत करने के लिए विवश मनुष्यों की दयनीय स्थिति का चित्रण किया है।
व्याख्या:
तुलसीदास कहते हैं कि मजदूर (किसबी), किसान परिवार, व्यापारी (बनिक), भिखारी, भाट (प्रशंसा करने वाले), नौकर (चाकर), चंचल नट, चोर, गुप्तचर (चार) और जादूगर—ये सभी लोग केवल अपने पेट की आग बुझाने के प्रयास में लगे हैं।
लोग पेट भरने के लिए पढ़ते हैं, कलाएँ सीखते हैं, पहाड़ों पर चढ़ते हैं और शिकार की खोज में दिनभर घने जंगलों में भटकते रहते हैं।
पेट की भूख शांत करने के लिए मनुष्य धर्म-अधर्म और अच्छे-बुरे सब काम करता है। परिस्थिति इतनी दर्दनाक है कि लोग अपने बच्चों (बेटा-बेटी) तक को बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
निष्कर्ष: तुलसीदास जी कहते हैं कि पेट की यह आग समुद्र की आग (बड़वाग्नि) से भी अधिक भयानक है, और इस आग को केवल श्री राम रूपी 'घनश्याम' (काले बादल/कृपा) रूपी जल से ही शांत किया जा सकता है।
विशेष/शिल्प सौंदर्य:
भाषा: साहित्यिक ब्रजभाषा।
अलंकार: 'राम घनस्याम' में रूपक अलंकार तथा 'किसबी किसान-कुल', 'गहन गन अहन' में अनुप्रास अलंकार।
रस: करुण रस।
2. दूसरा पद (कवित्त): "खेती न किसानों को, भिखारी को न भीख, बलि..."
मूल पंक्ति:
खेती न किसानों को, भिखारी को न भीख, बलि,
बनिक को न बनिज, न चाकर को चाकरी।
जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों 'कहाँ जाई, का करी?'
वेदों पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत,
साँकरे सबै पे, रावरी कृपा करि।'
दारिद-दशानन दबाई दुनी, दीनबंधु!
दुरुत-दहन देखि तुलसी हा-हा करी॥

प्रसंग: इस कवित्त में तत्कालीन समाज में फैली भयंकर बेरोजगारी, अकाल ,भुखमरी , शासन की पंगुता अन देखी और आर्थिक मंदी की भयावह तस्वीर पेश की गई है।
व्याख्या
किसान के पास खेती करने के लिए साधन नहीं हैं, भिखारी को भीख नहीं मिल रही, व्यापारी का व्यापार ठप है और नौकरों को काम (चाकरी) नहीं मिल रहा।
आजीविका के साधनों से विहीन सभी लोग अत्यंत दुखी होकर एक-दूसरे से बस यही पूछते हैं कि "अब कहाँ जाएँ और क्या करें?" हर ओर भुखमरी बेरोजगारी, भ्रष्टाचार का वातावरण है किसीको कोई मार्ग नहीं दिख रहा।
तुलसीदास प्रभु राम से प्रार्थना करते हैं कि वेदों और पुराणों में भी कहा गया है तथा लोक-व्यवहार में भी देखा गया है कि जब-जब संकट पड़ा है, आपने ही सब पर कृपा की है।
हे दीनबंधु! आज गरीबी रूपी रावण (दारिद-दशानन) ने पूरी दुनिया को अपने जाल में जकड़ लिया है। इस पाप रूपी अग्नि (दुरित-दहन) से पीड़ित संसार को देखकर तुलसीदास रक्षा के लिए 'हा-हा' (प्रार्थना) कर रहे हैं।

विशेष/शिल्प सौंदर्य:
अलंकार: 'दारिद-दशानन' (गरीबी रूपी रावण) और 'दुरित-दहन' (पाप रूपी अग्नि) में रूपक अलंकार।
वर्णन: तत्कालीन बेरोजगारी और सामाजिक बदहाली का यथार्थवादी चित्रण।

3. तीसरा पद (सवैया): "धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलाहा कहौ कोऊ..."
मूल पंक्ति:
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलाहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटी सों बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगारी न सोऊ।
तुलसी सरनाम गुरामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु वोऊ।
माँगि कै खाइबो, मसीत को सोइबो, लैबो को एकु न दैबे को दोऊ॥

प्रसंग: इस सवैये में तुलसीदास जी का स्वाभिमानी और अनन्य राम-भक्त रूप प्रकट होता है, जहाँ वे सामाजिक ताने-बाने और जातिगत आक्षेपों की पूरी तरह उपेक्षा करते हैं।
व्याख्या:
तुलसीदास कहते हैं कि समाज चाहे मुझे धूर्त (धूर्त/छली) कहे, संन्यासी (अवधूत) कहे, राजपूत कहे या जुलाहा (बुनकर) कहे—मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
मुझे अपनी किसी बेटी का ब्याह किसी के बेटे से करके किसी की जाति या कुल की मर्यादा नहीं बिगाड़नी है।
तुलसीदास पूरे समाज में केवल श्री राम के 'प्रसिद्ध गुलाम/दास' (सरनाम गुलाम) के रूप में जाने जाते हैं। जिसे जो मन में आए, वह मेरे बारे में कह सकता है।
मेरी जीवनशैली अत्यंत सरल है—मैं माँगकर खा लेता हूँ, मस्जिद में आराम से सो जाता हूँ। मुझे दुनिया से 'न एक लेना है, न दो देना' (किसी से कोई लेना-देना नहीं है)।
विशेष/शिल्प सौंदर्य:
छंद: सवैया छंद (गेयता और लयबद्धतायुक्त)।
अलंकार: 'काहू की बेटी सो बेटा' तथा 'लैबो को एकु न दैबे को दोऊ' में अनुप्रास अलंकार एवं प्रसिद्ध मुहावरा ("लेना एक न देना दो")।
भाव: कबीर की भाँति तुलसीदास का निर्भीक और स्वाभिमानी भक्ति-भाव।

Mcq
1. कवितावली के उत्तरकांड से उद्धृत पद किस भाषा में रचित हैं?
(क) अवधी
(ख) ब्रजभाषा
(ग) खड़ी बोली
(घ) मैथिली
उत्तर: (ख) ब्रजभाषा
2. तुलसीदास जी के अनुसार पेट की आग बुझाने का समर्थ साधन क्या है?
(क) अन्न और धन
(ख) कड़ी मेहनत
(ग) राम रूपी घनश्याम की कृपा
(घ) राजा की सहायता
उत्तर: (ग) राम रूपी घनश्याम की कृपा
3. 'दारिद-दशानन' शब्द में कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा अलंकार
(ख) अनुप्रास अलंकार
(ग) रूपक अलंकार
(घ) उत्प्रेक्षा अलंकार
उत्तर: (ग) रूपक अलंकार (गरीबी रूपी रावण)
4. तुलसीदास जी ने पेट की आग की तुलना किससे की है?
(क) दावानल (जंगल की आग) से
(ख) बड़वाग्नि (समुद्र की आग) से
(ग) जठराग्नि से
(घ) कामाग्नि से
उत्तर: (ख) बड़वाग्नि (समुद्र की आग) से
5. पेट भरने के लिए लोग क्या-क्या करने को विवश हो जाते हैं?
(क) ऊँचे-नीचे कर्म
(ख) धर्म-अधर्म
(ग) बेटा-बेटी को बेचना
(घ) उपयुक्त सभी
उत्तर: (घ) उपयुक्त सभी
6. "खेती न किसानों को, भिखारी को न भीख..." पद में तत्कालीन समाज की किस समस्या का यथार्थ चित्रण है?
(क) धार्मिक अंधविश्वास
(ख) भयंकर बेरोजगारी और अकाल
(ग) विदेशी आक्रमण
(घ) जातिगत भेदभाव
उत्तर: (ख) भयंकर बेरोजगारी और अकाल
7. "धूत कहौ, अवधूत कहौ..." सवैये में तुलसीदास जी का कौन-सा भाव प्रकट होता है?
(क) स्वाभिमानी और अनन्य राम-भक्ति
(ख) समाज से डरने का भाव
(ग) धन कमाने की लालसा
(घ) क्रोध और घृणा
उत्तर: (क) स्वाभिमानी और अनन्य राम-भक्ति
8. 'लैबो को एकु न दैबे को दोऊ' मुहावरे का क्या अर्थ है?
(क) व्यापार में लाभ कमाना
(ख) किसी से कोई संबंध या लेना-देना न रखना
(ग) कर्ज में डूब जाना
(घ) बहुत अधिक उधार देना
उत्तर: (ख) किसी से कोई संबंध या लेना-देना न रखना
9. तुलसीदास जी स्वयं को किसका गुलाम कहते हैं?
(क) समाज का
(ख) राजा का
(ग) श्री राम का
(घ) प्रकृति का
उत्तर: (ग) श्री राम का
10. "किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिकारी, भाट..." पंक्ति में मुख्य रूप से किस अलंकार की छटा देखने को मिलती है?
(क) अनुप्रास अलंकार
(ख) यमक अलंकार
(ग) श्लेष अलंकार
(घ) मानवीकरण अलंकार
उत्तर: (क) अनुप्रास अलंकार

प्रश्न 1: 'किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिखारी, भाट...' छंद के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास के समय समाज की आर्थिक स्थिति कैसी थी?
उत्तर:
तुलसीदास जी के समय समाज की आर्थिक स्थिति अत्यंत भयावह और शोचनीय थी:
बेरोजगारी और भुखमरी: किसान के पास खेती के लिए साधन या भूमि नहीं थी, व्यापारी के पास व्यापार नहीं था, और भिखारियों को भीख तक नहीं मिलती थी।
मजबूरी में अनुचित कार्य: पेट की आग (भूख) शांत करने के लिए लोग वेद-पुराण के विरुद्ध कार्य कर रहे थे। लोग अपने धर्म-कर्म त्यागकर अपनी संतानों तक को बेचने के लिए मजबूर थे।
व्यापक दरिद्रता: दरिद्रता रूपी 'रावण' ने संपूर्ण समाज को अपने शिकंजे में कस रखा था।
प्रश्न 2: पेट की आग का शमन (शांत) करने के लिए तुलसीदास जी किसे एकमात्र उपाय मानते हैं और क्यों?
उत्तर:
तुलसीदास जी पेट की आग को शांत करने के लिए केवल श्री राम की कृपा रूपी जल (मेघ) को एकमात्र उपाय मानते हैं।
उनके अनुसार, पेट की आग समुद्र की आग (बड़वाग्नि) से भी अधिक विनाशकारी होती है।
भौतिक या सांसारिक साधन इस अग्नि को बुझाने में असमर्थ हैं।
ईश्वर रूपी राम की भक्ति और कृपा ही मनुष्य को इस भौतिक व मानसिक संताप से मुक्ति दिला सकती है।
प्रश्न 3: 'धूत कहौ, अवधूत कहौ...' छंद में तुलसीदास के स्वाभिमान और भक्ति-भाव का परिचय कैसे मिलता है?
उत्तर:
इस छंद में तुलसीदास जी की अनन्य राम-भक्ति और निर्भीकता प्रकट होती है:
सामाजिक लोक-लाज से मुक्ति: उन्हें समाज द्वारा 'धूर्त', 'संन्यासी', 'कापूत' या 'राजपूत' कहे जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
जाति-पांति का खंडन: उन्हें अपनी किसी बेटी का विवाह किसी के बेटे से करके किसी की जाति नहीं बिगाड़नी है, इसलिए वे सामाजिक जातिगत ताने-बाने से ऊपर हैं।
आत्मनिर्भरता: वे केवल प्रभु राम के दास हैं। वे माँगकर खा सकते हैं और मस्जिद में सो सकते हैं। उन्हें किसी से 'एक लेना न दो देना' (कोई लेना-देना नहीं) है।
प्रश्न 4: तुलसीदास जी द्वारा रचित इन छंदों की काव्य-शिल्प (भाषा-शैली) की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भाषा: शुद्ध एवं साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग।
छंद: 'कवित्त' और 'सवैया' छंद का सुंदर प्रयोग।
अलंकार:
अनुप्रास अलंकार: 'किसबी किसान-कुल', 'बसै लेइ कै न देऊ को'।
रूपक अलंकार: 'दरिद-रावन', 'काहूकै बेटी सों बेटा न ब्याहब'।
रस: करुण रस (प्रथम छंद में) तथा शांत रस व भक्ति रस (द्वितीय छंद में)।
शैली: प्रबंधात्मकता के साथ-साथ गीति-काव्य एवं व्यंग्यात्मक शैली।
यदि आप पाठ के किसी विशेष पद्यांश का भावार्थ या 'लक्ष्मण मूर्छा और राम का विलाप' से जुड़े प्रश्न-उत्तर भी चाहते हैं, तो बताइए!

1. तुलसीकालीन भारत की आर्थिक एवं सामाजिक दशा
तुलसीदास जी का समय (16वीं-17वीं शताब्दी - मुगलकाल/उत्तर मध्यकाल) तीव्र सामाजिक विषमता, अकाल और प्रशासनिक उपेक्षा का युग था।
व्यापक बेरोजगारी और आजीविका का संकट: तुलसीदास जी लिखते हैं:
“किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिखारी, भाट,
चाकर, चपल नट, चोर, चार, चेतकी॥”
अर्थात समाज का प्रत्येक वर्ग—मजदूर, किसान, व्यापारी, भिखारी, भाट, नौकर, नट, चोर, गुप्तचर और बाजीगर—आजीविका के संकट से जूझ रहा था। किसी के पास कोई स्थायी कार्य नहीं था।
अकाल और भुखमरी: किसान के पास खेती के लिए साधन नहीं थे और व्यापारी के पास व्यापार के अवसर नहीं थे (“बली को न चाकर, न चाकर को चाकरी”)। भुखमरी इस सीमा तक बढ़ चुकी थी कि लोग अपने धर्म-कर्म और नैतिक मूल्यों को भूलकर अपनी संतानों तक को बेचने के लिए मजबूर थे।
सामाजिक असुरक्षा: तुलसी के युग में न तो कोई संगठित कल्याणकारी राज्य (Welfare State) था और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा योजना। पूरी अर्थव्यवस्था केवल प्रकृति (वर्षा) पर निर्भर थी।
2. आधुनिक भारत की स्थिति: चुनौतियाँ और परिवर्तन
आज का भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, किंतु बेरोजगारी और भुखमरी जैसी समस्याएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं; बल्कि उनका स्वरूप बदल गया है।

बेरोजगारी का नया स्वरूप 
तुलसी के समय में संकट मुख्य रूप से 'काम न मिलने' और तीव्र सामाजिक विषमता, अकाल और प्रशासनिक उपेक्षा का युग था। 'अकाल' का  युग था।
आज भारत में साक्षरता और तकनीकी शिक्षा बढ़ी है, परंतु 'शैक्षणिक बेरोजगारी' (Educated Unemployment) और 'प्रच्छन्न बेरोजगारी' (Disguised Unemployment) बड़ी चुनौतियाँ हैं। योग्यता के अनुरूप रोजगार न मिलना और युवाओं में असुरक्षा का भाव आज की मुख्य समस्या है।
वर्तमान में शिक्षा प्रणाली और कुछ नियमों  के कारण योग्य व्यक्ति  रोजगार योग्अयता अनुरूप   गरिमा स्थान और पद पाने से वंचित हैं। उदाहरण के लिए चिकित्सा विभाग में परीक्षा प्रणाली आवंटन,जो भावी समय में  भयावह स्थिति पैदा करेगा। जीवन से खिलवाड़ करेगा। सामाजिक असंतोष को बढ़ावा देगा।

भुखमरी और खाद्य सुरक्षा (Food Security):
तुलसी के युग में अनाज का उत्पादन प्रकृति की दया पर निर्भर था, जिससे व्यापक अकाल पड़ता था।
आधुनिक भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर है। आज भुखमरी का कारण खाद्यान्न की कमी नहीं, बल्कि वितरण प्रणाली की असमानता और क्रय शक्ति (Purchasing Power) का अभाव है। हालांकि, भारत सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और मुफ्त राशन योजनाओं ने तुलसीकालीन 'भुखमरी से होने वाली मौतों' जैसी स्थिति पर व्यापक रोक लगाई है।
3. दोनों युगों में तुलनात्मक अंतर
आधारतुलसीकालीन भारतआधुनिक भारत (21वीं सदी)
संकट का मुख्य कारणप्राकृतिक अकाल, सिंचाई व तकनीक का अभाव, प्रशासनिक उपेक्षा।जनसंख्या दबाव, कौशल और रोजगार के बीच असमानता (Skill Gap)।
राज्य की भूमिकाजनकल्याणकारी योजनाओं का अभाव; प्रजा ईश्वर/प्रकृति पर आश्रित।संवैधानिक कल्याणकारी राज्य; MNREGA, राशन योजनाएँ, सामाजिक सुरक्षा।
खाद्य उपलब्धताअनाज का प्रत्यक्ष संकट और भुखमरी से अकाल-मृत्यु।अनाज का पर्याप्त भंडार; समस्या केवल समतामूलक वितरण की।
सामाजिक सोचलोग मजबूरी में अनैतिक कार्य या पलायन को विवश।तकनीकी शिक्षा, स्वरोजगार (Startups), और वैश्वीकरण के नए अवसर।

निष्कर्षतः, तुलसीकालीन भारत और आधुनिक भारत में बहुत बड़ा अंतर आया है। आधुनिक भारत ने संस्थागत ढाँचे, वैज्ञानिक कृषि, आपातकालीन खाद्य सुरक्षा और सरकारी योजनाओं के माध्यम से तुलसीकालीन 'अकाल और भयावह भुखमरी' जैसी स्थितियों पर काफी हद तक विजय प्राप्त कर ली है।
हालाँकि, 'आजीविका की चिंता' और 'आर्थिक विषमता' आज भी एक मानवीय सत्य के रूप में बनी हुई है। तुलसीदास जी द्वारा किया गया सामाजिक चित्रण आज भी हमें यह याद दिलाता है कि किसी भी प्रगतिशील समाज का अंतिम लक्ष्य समाज के अंतिम व्यक्ति (किसानी, मजदूर, युवा) को गरिमापूर्ण आजीविका प्रदान करना ही होना चाहिए।

प्रमुख काव्यांश की ससंदर्भ व्याख्या

काव्यांश:

तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंतु।

अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंतु॥


2. श्रीराम का विलाप

उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी॥

अर्ध राति गई कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ॥

सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ॥

मम हित लाग तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता॥

सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई॥

जौ जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू॥

अर्थ: उधर (लंका की सीमा में) राम जी मूर्छित पड़े लक्ष्मण को देखकर एक साधारण मनुष्य की भाँति विलाप करते हुए बोले—"आधी रात बीत चुकी है, परंतु हनुमान नहीं आए।" राम जी ने छोटे भाई लक्ष्मण को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया। वे बोले—"हे भाई! तुम मुझे कभी दुखी नहीं देख सकते थे, तुम्हारा स्वभाव सदैव कोमल था। मेरे हित के लिए तुमने अपने माता-पिता को छोड़ दिया और जंगल में सर्दी, धूप और तूफ़ान (हवा) के कष्ट सहे। हे भाई! अब वह प्रेम कहाँ गया? तुम मेरी व्याकुलता भरी बातों को सुनकर उठते क्यों नहीं? यदि मुझे ज्ञात होता कि वन में भाई का बिछोह होगा, तो मैं पिता के वचनों को भी नहीं मानता।"

सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥

अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥

जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना॥

अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही॥

जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई॥

बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं॥

अर्थ: "पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार—ये संसार में बार-बार मिलते और बिछड़ते रहते हैं। हे तात! हृदय में ऐसा विचार करके जाग जाओ, क्योंकि संसार में सहोदर (सगा) भाई बार-बार नहीं मिलता। जिस प्रकार पंख के बिना पक्षी अत्यंत दीन-हीन हो जाता है, मणिविहीन नाग और सूंड के बिना श्रेष्ठ हाथी असमर्थ हो जाता है, यदि कठोर भाग्य मुझे जीवित रखेगा, तो भाई तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी वैसा ही असहाय होगा। मैं कौन सा मुँह लेकर अयोध्या जाऊँगा कि पत्नी के लिए प्रिय भाई को गँवा आया? संसार में पत्नी खोने का अपयश भले सह लेता, क्योंकि स्त्री की हानि कोई विशेष क्षति नहीं है।"

अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा॥

निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम प्रान अधारा॥

सॉपिसि मोहि कर गहि पानी। सब बिधि कुसल मातु हित जानी॥

उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि बेगि मोहि सिखावहु भाई॥

बहुबिधि सोचत सोच बिमोचन। स्रवत सलिल राजीव दल लोचन॥

उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥

अर्थ: "अब मेरा निष्ठुर और कठोर हृदय यह अपयश और तुम्हारा शोक दोनों सहेगा। हे तात! तुम अपनी माता के एक ही पुत्र हो और उनके प्राणों के आधार हो। उन्होंने सब प्रकार से कुशल और मेरा हितैषी जानकर तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हें मुझे सौंपा था। अब मैं वहाँ जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! तुम उठकर मुझे स्वयं क्यों नहीं समझाते?"

सबके सोच को दूर करने वाले प्रभु श्रीराम इस प्रकार अनेक प्रकार से सोच (विलाप) कर रहे हैं और उनके कमल की पंखुड़ियों जैसे नेत्रों से अश्रुओं की धारा बह रही है। (शिव जी कहते हैं—) हे उमा! रघुनाथ जी अद्वितीय और अखंड हैं, वे तो केवल अपने भक्तों पर कृपा करके साधारण मनुष्य की लीला

 दिखा रहे हैं।

3. संजीवनी बूटी लेकर हनुमान जी का आगमन

सोरठा:

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।

आइ गयउ हनुमान जिमि करुना मँह बीर रस॥

अर्थ: प्रभु श्रीराम का विलाप सुनकर वानरों का समूह अत्यंत व्याकुल हो गया। ठीक उसी समय हनुमान जी (संजीवनी बूटी लेकर) आ पहुँचे, जैसे करुण रस के प्रसंग में अचानक वीर रस का आगमन हो गया हो।




संदर्भ:


प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह भाग-2' में संकलित 'लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप' शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी हैं और यह अंश महाकाव्य 'रामचरितमानस' के 'लंकाकांड' से उद्धृत है।


प्रसंग:


लंका युद्ध में मेघनाद के शक्ति-बाण से लक्ष्मण जी मूर्छित हो जाते हैं। सुषेण वैद्य की सलाह पर हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने जाते हैं। रास्ते में भरत जी के बाण से घायल होकर उतरने के बाद, भरत जी से आज्ञा लेकर हनुमान जी पुनः लंका की ओर प्रस्थान करते हैं। दूसरी ओर, आधी रात बीत जाने पर भी हनुमान जी के न लौटने पर श्रीराम एक साधारण मनुष्य की तरह विलाप करते हैं।


व्याख्या:


हनुमान जी भरत जी से कहते हैं कि हे नाथ! मैं आपका प्रताप हृदय में धारण करके तुरंत चला जाऊँगा। ऐसा कहकर और भरत जी के चरणों की वंदना करके हनुमान जी उड़ चलते हैं।


दूसरी ओर युद्ध क्षेत्र में श्रीराम मूर्छित लक्ष्मण को देखकर साधारण मानव के समान विलाप करते हुए कहते हैं कि आधी रात बीत चुकी है, लेकिन वानर (हनुमान) अभी तक नहीं आए। यह सोचकर राम ने छोटे भाई लक्ष्मण को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया। राम कहते हैं—"हे भाई! तुम मुझे कभी दुखी नहीं देख सकते थे। तुम्हारा स्वभाव सदा से ही अत्यंत कोमल रहा है। मेरे लिए तुमने माता-पिता का त्याग कर दिया और वन में सर्दी, धूप और हवा के कष्ट सहे।"


विशेष / काव्य-सौंदर्य:


भाषा: साहित्यिक अवधि भाषा का सुंदर प्रयोग।

रस: करुण रस की प्रधानता।

छंद: दोहा और चौपाई छंद।

अलंकार: 'कपि नहिं आयऊ', 'मृदुल स्वभावू' में अनुप्रास अलंकार।

शैली: प्रसादात्मक और भावात्मक शैली; राम के मानवीय रूप का सजीव चित्रण।

लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप: बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. 'लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप' प्रसंग रामचरितमानस के किस कांड से लिया गया है?

​(क) बालकांड

(ख) सुंदरकांड

(ग) लंकाकांड

(घ) अयोध्याकांड

उत्तर: (ग) लंकाकांड

2. लक्ष्मण को शक्ति-बाण किसने मारा था?

​(क) रावण ने

(ख) कुंभकर्ण ने

(ग) मेघनाद (इंद्रजीत) ने

(घ) अहिरावण ने

उत्तर: (ग) मेघनाद (इंद्रजीत) ने

3. लक्ष्मण के इलाज के लिए किस वैद्य को बुलाया गया था?

​(क) सुषेण वैद्य

(ख) धनवंतरी

(ग) चरक

(घ) अश्विनी कुमार

उत्तर: (क) सुषेण वैद्य

4. हनुमान जी संजीवनी बूटी लाते समय रास्ते में किस से मिले और बाण लगने से गिर पड़े थे?

​(क) सुग्रीव से

(ख) भरत से

(ग) विभीषण से

(घ) अंगद से

उत्तर: (ख) भरत से

5. "सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ" – इस पंक्ति में राम, लक्ष्मण के किस गुण का उल्लेख कर रहे हैं?

​(क) उनकी वीरता का

(ख) उनके कोमल और स्नेही स्वभाव का

(ग) उनके क्रोध का

(घ) उनकी बुद्धिमत्ता का

उत्तर: (ख) उनके कोमल और स्नेही स्वभाव का

6. राम के अनुसार, पंख के बिना पक्षी और मणि के बिना सांप जैसी स्थिति लक्ष्मण के बिना किसकी हो गई है?

​(क) सुग्रीव की

(ख) हनुमान की

(ग) स्वयं श्रीराम की

(घ) कौसल्या की

उत्तर: (ग) स्वयं श्रीराम की

7. राम को विलाप करते देखकर वानर सेना में कौन-सा रस छा गया था?

​(क) वीर रस

(ख) करुण रस

(ग) भयानक रस

(घ) शांत रस

उत्तर: (ख) करुण रस

8. हनुमान जी के संजीवनी लेकर आने पर करुण रस किस रस में बदल गया?

​(क) हास्य रस

(ख) वीर रस

(ग) अद्भुत रस

(घ) रौद्र रस

उत्तर: (ख) वीर रस

9. "उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुहारी॥" – यहाँ 'मनुज अनुहारी' का क्या अर्थ है?

​(क) देवताओं की तरह

(ख) साधारण मनुष्य के समान

(ग) राजा की तरह

(घ) दानव की तरह

उत्तर: (ख) साधारण मनुष्य के समान

10. जागने पर कुंभकर्ण ने रावण को क्या धिक्कारते हुए कहा?

​(क) तुमने युद्ध क्यों शुरू किया?

(ख) तुमने साक्षात् जगदंबा (सीता) का हरण किया है, अब तुम्हारा कल्याण संभव नहीं।

(ग) तुम वानरों से डर गए हो।

(घ) तुमने मुझे अससमय क्यों जगाया?

उत्तर: (ख) तुमने साक्षात् जगदंबा (सीता) का हरण किया है, अब तुम्हारा कल्याण संभव नहीं।

11. यह पूरा प्रसंग मुख्य रूप से किन छंदों में रचित है?

​(क) केवल कवित्त

(ख) दोहा और चौपाई

(ग) केवल सवैया

(घ) छप्पय और कुंडलिया

उत्तर: (ख) दोहा और चौपाई

12. 'लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप' की मुख्य भाषा कौन-सी है?

​(क) ब्रजभाषा

(ख) खड़ी बोली

(ग) अवधी

(घ) मैथिली

उत्तर: (ग) अवधी

पाठ्यपुस्तक एवं परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1: राम के विलाप को सुनकर वानर सेना और प्रकृति पर क्या प्रभाव पड़ा?

  • उत्तर: लक्ष्मण के मूर्छित होने पर श्रीराम के करुणामयी विलाप को देखकर वानरों और भालुओं का समूह भी भावुक होकर रोने लगा। संपूर्ण सेना में निराशा और शोक का वातावरण छा गया।

प्रश्न 2: "जथा पंख बिनु खग अति दीना..." चौपाई के माध्यम से राम ने अपनी किस विवशता को व्यक्त किया है?

  • उत्तर: श्रीराम कहते हैं कि जिस प्रकार पंख के बिना पक्षी, मणि के बिना सांप और सूंड के बिना हाथी अत्यंत असहाय और दीन हो जाता है, उसी प्रकार लक्ष्मण के बिना उनका जीवन भी व्यर्थ और शक्तिहीन हो गया है।

प्रश्न 3: कुंभकर्ण के जागने पर रावण और कुंभकर्ण के बीच क्या बातचीत हुई?

  • उत्तर: जब रावण के जगाने पर कुंभकर्ण जागा, तो उसने रावण से उसकी व्याकुलता का कारण पूछा। रावण ने सीता-हरण से लेकर युद्ध में बड़े-बड़े राक्षसों के मारे जाने की पूरी कथा सुनाई। इस पर कुंभकर्ण ने रावण को धिक्कारते हुए कहा कि जगदंबा (सीता) का हरण करके अब तुम कल्याण चाहते हो, जो कभी संभव नहीं है।

प्रश्न 4: हनुमान के लौटने पर वातावरण में क्या परिवर्तन आया?

  • उत्तर: संजीवनी बूटी लेकर हनुमान जी के पहुंचते ही शोक और करुण रस से भरे वातावरण में उत्साह भर गया। तुलसीदास जी ने इस दृश्य की तुलना "करुण रस में वीर रस के आविर्भाव" से की है। लक्ष्मण के स्वस्थ होते ही श्रीराम ने उन्हें गले लगाया और पूरी सेना में खुशी की लहर दौड़ गई। 

उत्तर: तुलसीदास जी के समय समाज की स्थिति अत्यंत दयनीय थी:
रोज़गार की कमी: किसान, व्यापारी, भिखारी, सेवक आदि सभी के पास आजीविका का कोई साधन नहीं था।
अकाल की स्थिति: किसानों की खेती नष्ट हो चुकी थी और लोगों को खाने के लिए अन्न तक नसीब नहीं हो रहा था।
मजबूरी और लाचारी: गरीबी और भूखमरी के कारण लोग इतने विवश थे कि अपने बच्चों तक को बेचने के लिए तैयार हो जाते थे।
अधर्म का बोलबाला: पेट की आग बुझाने के लिए लोग उचित-अनुचित और अधर्म का मार्ग अपना रहे थे।
प्रश्न 2: 'धूत कहौ, अवधूत कहौ...' छंद में तुलसी के स्वाभिमान और भक्ति-भाव का परिचय किस प्रकार मिलता है?
उत्तर: इस छंद में तुलसीदास जी की ईश्वर-भक्ति और स्वाभिमान प्रकट होता है:
सामाजिक टिप्पणी की परवाह नहीं: लोग उन्हें 'धूत' (धूर्त), 'अवधूत' (संन्यासी), 'जातिहीन' या जो भी कहें, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
जाति-पांति का खंडन: वे कहते हैं कि उन्हें किसी की बेटी से अपने बेटे का ब्याह करके किसी की जाति नहीं बिगाड़नी है।
पूर्ण समर्पण: तुलसी स्वयं को केवल 'राम का गुलाम' मानते हैं। वे भीख मांगकर खा सकते हैं और मस्जिद में सो सकते हैं, लेकिन राम के अलावा किसी अन्य के आगे हाथ नहीं फैलाते।
प्रश्न 3: लक्ष्मण के मूर्छित होने पर राम के विलाप में उनके किस मानवीय रूप के दर्शन होते हैं?
उत्तर: राम ईश्वर के अवतार होते हुए भी साधारण मनुष्य की तरह भ्रातृ-शोक (भाई का दुख) में व्याकुल दिखाई देते हैं:
भ्रातृ-प्रेम: राम कहते हैं कि वे अयोध्या लौटने पर माता कौसल्या को क्या मुंह दिखाएंगे। लोग कहेंगे कि राम ने अपनी पत्नी (सीता) के लिए प्रिय भाई को गंवा दिया।
मानवीय कातरता: वे लक्ष्मण को जगाने के लिए व्याकुल होकर कहते हैं, "जैसे पंख के बिना पक्षी, मणि के बिना सांप और सूंड के बिना हाथी असहाय होता है, वैसे ही तुम्हारे बिना मेरा जीवन व्यर्थ है।"
पछतावा: वे कहते हैं कि यदि मुझे पता होता कि वन में भाई का बिछोह सहना पड़ेगा, तो मैं पिता के वचनों को मानकर वन कभी न आता।
प्रश्न 4: 'सोरठा' में वर्णित हनुमान जी के आगमन से युद्ध-क्षेत्र के वातावरण में क्या परिवर्तन आया?
उत्तर: जब लक्ष्मण मूर्छित थे और राम विलाप कर रहे थे, तब संपूर्ण वानर सेना में निराशा और करुण रस छाया हुआ था।
संजीवनी बूटी लेकर हनुमान जी के आते ही करुण रस का वातावरण वीर रस में बदल गया।
वानरों और भालुओं में नया उत्साह भर गया। यह ठीक वैसा ही दृश्य था जैसे करुण रस के प्रसंग में वीर रस का आविर्भाव (प्रकट होना) हो गया हो।
प्रश्न 5: भ्रातृ-शोक में विकल राम को देखकर वानर सेना की क्या दशा हुई?
उत्तर: प्रभु राम को सामान्य मनुष्य की तरह रोते और विलाप करते देखकर वानर और भालुओं का समूह भी दुखी और व्याकुल हो गया। संपूर्ण वातावरण में शोक और निराशा छा गई।




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